("Dharasur" is originated by the name of Lord Shiva .There is a temple of lord Shiva situated on the bank of river Godavari, that is called Dhareshwar . Temple was built in 11th century during Chalukyan regime. This temple is supposed to be one of the few amongst having Shikhar intact so far.)
महाराष्ट्र के परभणी जिले का गंगाखेड़ तहसील यहां के पुराने मंदिरोंसे अपनी पहचान बनाये बैठा तो है मगर अब यहांकी धरोहरोंका भविष्य अँधेरे में दिखाई पड़ता है। वास्तुकला के अनेक तरह के नमूनों से बना ये शहर अपने धुंदलेसे आनेवाले कल की तरफ पीठ मोड बैठा है। यहाँ सरकार भी गुनहगार है और हम भी।
सावन के महीने से टाइमलाइन पर आदियोगी महादेव जी की तस्वीरें और शुभकामनाओंसे भरा देख मन प्रसन्न सा रहता है। हम हररोज या मानो हर हफ्ते महादेवजी की पूजा करने नजदीक के मंदिर में समय से पहुँच भी रहे हैं। बेल के पत्तोंसे सुरभित देवालयोंके गर्भगृह मन में शान्ति भर देने में हमेशा सफल रहें है। 'ॐ' का उच्चार भी तो है। लेकिन कुछ था की हमने इस एक मंदिर के बारे में सुना था और आज उसे ढूंढने और वहां जाने का मन किया। गंगाखेड़ शहर के पास ही गोदावरी के किनारे पे बसे 'धारासुर' नामक इस छोटे गांव में नदी के तट पर ही बसे हैं शंकरजी। साथ में नंदी भी है और कुछ है जो इसकी महत्वता का परिचय है। वो है इसकी 'हेमाडपन्ति रचना।' १३ वि शताब्दी का यह मंदिर कसबे के सबसे पुराने वास्तुओंमेंसे एक है।
ऊँचा कलश, मोहक सा शिखर पाससे गुजरती प्रवाह में चलती गोदावरी और अचम्भित करता हुआ ये अद्भुत ऐतिहासिक शिल्प। मन्दिर मानो किसी बहुत बड़े महादेव भक्त ने पुरे दिल से बनाया हो। 'गुप्तेश्वर मन्दिर' की दीवारें काले पत्थरोंपर शिल्पकला के विभिन्न नमुनोंसे भरी है। गणेशजी, देवियाँ और देवताओंके साथ ही कामुक मूर्तियाँ भी खजूराओंके के मंदिर दिलाती है। शंकर जी मूर्ति जस की तस है और बड़ी प्रसन्न भी। गाँववालोंको बीएस इतना पता है की यह मन्दिर हेमाडपंत वास्तुकला से बना है और काफी पुराना है।
मंदिर का काफी हिस्सा अभी भी भले ही शानदार लगता हो, लेकिन दिल टूट सा जाता है जब इसका दूसरा हिस्सा आप देख लेते हैं। दीवारें टूट कर गिर रहीं है और शिखर भी आधा गिर चूका है। ७०० बरस का जप मानो थम जाएगा जल्द ही। केदारनाथ के मंदिर को भगवान् ने बचा ही लिया था। पर अब इसे बचने शायद ही कोई आएगा। ऐसे ४-५ वास्तुकला से बने पुराने ऐतिहासिक धरोहर के अलावा नजदीक कुछ भी नहीं। सरकारोनें मानो इसको भुला ही दिया हो। गाँव के लोग अपनी क्षमता के अनुसार इसे बचा तो रखें है पर इसका सहीसे संधारण करना पुरे इलाके के बस की बात ही नहीं।
बाकी हम है और आप हैं। और ये समाज है हमारा जो बस चिंता में मग्न है!!
महाराष्ट्र के परभणी जिले का गंगाखेड़ तहसील यहां के पुराने मंदिरोंसे अपनी पहचान बनाये बैठा तो है मगर अब यहांकी धरोहरोंका भविष्य अँधेरे में दिखाई पड़ता है। वास्तुकला के अनेक तरह के नमूनों से बना ये शहर अपने धुंदलेसे आनेवाले कल की तरफ पीठ मोड बैठा है। यहाँ सरकार भी गुनहगार है और हम भी।
सावन के महीने से टाइमलाइन पर आदियोगी महादेव जी की तस्वीरें और शुभकामनाओंसे भरा देख मन प्रसन्न सा रहता है। हम हररोज या मानो हर हफ्ते महादेवजी की पूजा करने नजदीक के मंदिर में समय से पहुँच भी रहे हैं। बेल के पत्तोंसे सुरभित देवालयोंके गर्भगृह मन में शान्ति भर देने में हमेशा सफल रहें है। 'ॐ' का उच्चार भी तो है। लेकिन कुछ था की हमने इस एक मंदिर के बारे में सुना था और आज उसे ढूंढने और वहां जाने का मन किया। गंगाखेड़ शहर के पास ही गोदावरी के किनारे पे बसे 'धारासुर' नामक इस छोटे गांव में नदी के तट पर ही बसे हैं शंकरजी। साथ में नंदी भी है और कुछ है जो इसकी महत्वता का परिचय है। वो है इसकी 'हेमाडपन्ति रचना।' १३ वि शताब्दी का यह मंदिर कसबे के सबसे पुराने वास्तुओंमेंसे एक है।
ऊँचा कलश, मोहक सा शिखर पाससे गुजरती प्रवाह में चलती गोदावरी और अचम्भित करता हुआ ये अद्भुत ऐतिहासिक शिल्प। मन्दिर मानो किसी बहुत बड़े महादेव भक्त ने पुरे दिल से बनाया हो। 'गुप्तेश्वर मन्दिर' की दीवारें काले पत्थरोंपर शिल्पकला के विभिन्न नमुनोंसे भरी है। गणेशजी, देवियाँ और देवताओंके साथ ही कामुक मूर्तियाँ भी खजूराओंके के मंदिर दिलाती है। शंकर जी मूर्ति जस की तस है और बड़ी प्रसन्न भी। गाँववालोंको बीएस इतना पता है की यह मन्दिर हेमाडपंत वास्तुकला से बना है और काफी पुराना है।
मंदिर का काफी हिस्सा अभी भी भले ही शानदार लगता हो, लेकिन दिल टूट सा जाता है जब इसका दूसरा हिस्सा आप देख लेते हैं। दीवारें टूट कर गिर रहीं है और शिखर भी आधा गिर चूका है। ७०० बरस का जप मानो थम जाएगा जल्द ही। केदारनाथ के मंदिर को भगवान् ने बचा ही लिया था। पर अब इसे बचने शायद ही कोई आएगा। ऐसे ४-५ वास्तुकला से बने पुराने ऐतिहासिक धरोहर के अलावा नजदीक कुछ भी नहीं। सरकारोनें मानो इसको भुला ही दिया हो। गाँव के लोग अपनी क्षमता के अनुसार इसे बचा तो रखें है पर इसका सहीसे संधारण करना पुरे इलाके के बस की बात ही नहीं।
बाकी हम है और आप हैं। और ये समाज है हमारा जो बस चिंता में मग्न है!!






